10 महाविद्याओं में प्रथम मां काली की आराधना से हर प्रकार का कष्ट दूर होता है : श्रीमहंत नारायण गिरि

  • श्री दूधेश्वर नाथ मठ महादेव मंदिर में गुप्त नवरात्रि के पहले दिन मां काली की हुई आराधना।
  • इनका रूप भले ही भयंकर है, मगर भक्तों के लिए ये बहुत दयालु हैं।

गाजियाबाद। सिद्धपीठ श्री दूधेश्वर नाथ मठ महादेव मंदिर में गुप्त नवरात्रि पर मां की 10 महाविद्याओं की विशेष पूजा-अर्चना शुरू हो गई। पहले दिन मां काली की पूजा-अर्चना हुई। श्री दूधेश्वर पीठाधीश्वर, श्री पंच दशनाम जूना अखाडा के अंतरराष्ट्रीय प्रवक्ता, दिल्ली संत महामंडल के राष्ट्रीय अध्यक्ष व हिंदू यूनाइटिड फ्रंट के अध्यक्ष श्रीमहंत नारायण गिरि महाराज के पावन सानिध्य में मंगलाचरण, दीप पूजन, गणेश गौरी, मातृकादि, प्रधान कलश पूजन के पश्चात मां भगवती महाकाली महालक्ष्मी महासरस्वती व दश महाविद्याओं की प्रथम देवी भगवती महाकाली का वैदिक विधि विधान से षोडशोपचार पूजन किया गया। भगवती को उड़द की खिचड़ी पकवान मालपुआ और शहद का भोग लगाया गया।

इस अवसर पर श्रीमहंत नारायण गिरि महाराज ने कहा कि गुप्त नवरात्रि महोत्सव में भगवती जगत् जननी मां पराम्बा श्री महाकाली, महालक्ष्मी व महा सरस्वती का आराधना का विशेष महत्व है। साधक गुप्त साधना कर गुप्त मंत्रों का जाप गुप्त प्रयोग कर साधक अपनी वांछित फल की प्राप्ति करते हैं। 10 महाविद्याएं श्री महाकाली, महालक्ष्मी व महा सरस्वती का ही स्वरूप हैं और 10 महाविद्याओं में प्रथम रूप मां काली का है। मां काली की पूजा-आराधना से हर प्रकार का कष्ट दूर होता है। माता दुर्गा ने राक्षसों का वध करने के लिए यह रूप धारण किया था। सिद्धि प्राप्त करने के लिए माता के इस रूप की पूजा की जाती है। जिस तरह से भगवान शिव जल्दी प्रसन्न और जल्द रूठने वाले देवता हैं। उसी तरह काली माता भी स्वभाव है। अतः जो भी भक्त इनकी साधना कर चाहता है उसे एकनिष्ठ और पवित्र मन का होना चाहिए। देवताओं और दानवों के बीच हुए युद्ध में मां काली ने ही देवताओं को विजय दिलवाई थी। कोलकाता, उज्जैन और गुजरात में महाकाली के जागृत चमत्कारी मंदिर हैं।

श्रीमहंत नारायण गिरि ने बताया कि दस महाविद्या में काली प्रथम रूप है। मां काली की पूजा के लिए विशेष दिन शुक्रवार और अमावस्या हैं। मां काली को प्रसन्न करने के लिए ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि कालिके स्वाहा मंत्र के जाप से प्रसन्न किया जा सकता है। इनके केश खुले हुए व अस्त-व्यस्त हैं। तीन नेत्र हैं और चार हाथ हैं। ये हाथों में खड्ग, राक्षस की खोपड़ी लिए हैं और अभय मुद्रा व वर मुद्रा में अपने भक्तों की रक्षा करती हैं व वर देकर उनकर मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं। मुख के भाव अत्यधिक क्रोधित व फुंफकार मारते हैं। गले व कमर में राक्षसों की मुंडियों की माला व जीभ अत्यधिक लंबी व रक्त से भरी हुई हैं। इनका रूप देखने में भले ही भयंकर लगता है, मगर ये अपने भक्तों के लिए बहुत ही दयालु हैं और सच्चे मन से नाम लेने भर से ही उनक सभी इच्छाओं को पूर्ण कर देती हैं। रक्तबीज व शुंभ निशुंभ राक्षसों का वध करने के लिए माँ काली का प्राकट्य हुआ था।

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